COVID-19 और व्यवहार परिवर्तन की चुनौती पर विशेष कविता / “खुली हैं सड़कें, और यहां वहां पे बिखरे हैं लोग”

“खुली हैं सड़कें, और यहां वहां पे बिखरे हैं लोग”

एक पल को कभी लगता था कि इसके पास ना जाना ||2||
आज उसी के साथ पार्टियां मानते फिरते हैं ये लोग,
एक मास्क चड़ी है चेहरे पे, क्योंकि यहां डर का है माहौल,
ओ शक्स सही है, या गलत इसका विचार करते हैं लोग,
फिर भी बिना मास्क के सड़कों पे घूमते हैं ये लोग,
क्योंकि, खुली हैं सड़कें, और यहां वहां पे बिखरे है लोग,
गलियां सुनसान थी पहले, अब उसमें चहचहाते हैं लोग ।

सोशल डिस्टेंस के नाम पे, बड़ा बड़ा बात फेकते हैं ||2||
और जाकर देखो तो एक दूसरे से चिपक के खड़े होते हैं,
घर में कहते हैं किसी जरूरी काम से जा रहा हूं बाहर,
और देखो तो ठेलों और चाय दुकान में उमड़े हुए है लोग,
कोई सिगरेट की कश ले रहा, तो कोई पान गुटखा खा रहा,
कोई चुइंगम चबा रहा तो कोई दारू के पैग बना रहा,
यहां तो सोशल डिस्टैंसिंग की ही धज्जियां उड़ा रहे हैं लोग,
क्योंकि,खुली हैं सड़कें, और यहां वहां पे बिखरे है लोग,
गलियां सुनसान थी पहले, अब उसमें चहचहाते हैं लोग ।।

मां कहती है घर पे रह, तुझे जो चाहिए मैं बना के दूंगी ||2||
पर अब भी चिप्स, कुरकुरे,पॉपकॉर्न के पीछे पड़े हैं लोग,
ना जाने क्या नशा है इस गुपचुप वाले के हाथ में,
यहां तो अब भी लाईने लगा के खड़े हुए हैं लोग,
क्योंकि, खुली हैं सड़कें, और यहां वहां पे बिखरे है लोग,
गलियां सुनसान थी पहले, अब उसमें चहचहाते हैं लोग।

ना जाने कौन से ये बीमारी आयी है, इन तंग गलियों में ||2||
यहां अपनों से ही अपनों को पराया समझने लगे हैं लोग,
2 गज की दूरी का ऐहसास, किसी को आज तक हुआ नहीं,
कोई दूर हो तो उसे भी पास में खीच लाते हैं लोग,
एक असुरक्षा, जीवन पर पड़ सकती है भारी कहके,
औरों को भी यहां गले लगाते फिरते हैं लोग,
क्योंकि, खुली हैं सड़कें, और यहां वहां पे बिखरे है लोग,
गलियां सुनसान थी पहले, अब उसमें चहचहाते हैं लोग ।।

सरकार कहती है, अपने खुद के लिए कुछ करो ||2||
पर यहां तो औरों के पैसों पे जीकर भी बेसुध पड़े हैं लोग,
कहते हैं सिस्टम ही खराब है इस नकारा सरकार की,
तो क्यों अपने मन की ही करते हैं यहां लोग,
कुछ तो सुनो सरकार की, ओ भी तुम्हारे लिए ही कर रहा,
तो क्यों उसी के ऊपर ये तंज कसने लगे हैं लोग,
क्योंकि, खुली हैं सड़कें, और यहां वहां पे बिखरे है लोग,
गलियां सुनसान थी पहले, अब उसमें चहचहाते हैं लोग ।।

जीडीपी गिर गई तो सरकार पे पलडा झाड़ने लगे ||2||
यहां बड़ी बड़ी कंपनियों के स्क्रू ढीले पड़ने लगे,
नौकरियां लोगों के हाथों से युं पल भर में छूटने लगे,
उनका दर्द समझ जो बिना पैसों के भूखे मरने लगे लोग,
क्योंकि खुली हैं सड़कें, और यहां वहां पे बिखरे है लोग,
गलियां सुनसान थी पहले, अब उसमें चहचहाते हैं लोग ।।

सरकार पे उंगली करने वाले लाखों भक्त निकले ||2||
उसने क्या किया और क्यों किया ये भी कहने लगे लोग,
जब मुफ्त का खाना और राशन मिला तब कहां थे ये लोग,
लोगों को घर पहुंचना, सरकार की जिम्मेदारी है कहकर,
अपने कर्तव्य से मुंह फेरते थे यहां लोग,
भूखे को कुछ दिया नहीं,और बड़ी बड़ी डिंग हाकते हैं लोग,
क्योंकि, खुली हैं सड़कें, और यहां वहां पे बिखरे है लोग,
गलियां सुनसान थी पहले, अब उसमें चहचहाते हैं लोग ।।

वक़्त है थम जा बंदे, कुछ पल अपनों के साथ बिता ले ||2||
ये ज़िन्दगी कीमती है, इसको भी तो तू समझ ले,
चल तेरी कोई गलती नहीं, फिर भी तू समझ ले,
अब ना सुधरा तो तू मौत से अपनी दोस्ती बढ़ा ले,
कुछ पल का मेहमान है तू अब बस इतना समझ ले,
अब भी ना समझा हो तो घूम सड़कों में लोगों के साथ,
क्योंकि, खुली हैं सड़कें, और यहां वहां पे बिखरे है लोग,
गलियां सुनसान थी पहले, अब उसमें चहचहाते हैं लोग ।।
गलियां सुनसान थी पहले, अब उसमें चहचहाते हैं लोग ।।

द्वारा – रौशन नायक,
तरकेला , जिला – रायगढ़ (छत्तीसगढ़ )

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