पुस्तक सारांश / अति प्रभावकारी लोगों की 7 आदतें – भाग 4; आदत 3 – पहली चीज़ें पहले रखें (व्यक्तिगत मैनेजमेंट के सिद्धांत)

यह आदत अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए हमें सिद्धांत केंद्रित होना सिखाती है। यह कार्यों को प्राथमिकता से करने की आवश्यकता पर प्रकाश डालता है। तीसरी आदत पहली तथा दूसरी आदतों का व्यक्तिगत फल तथा व्यावहारिक परिणाम हैं। पहली और दूसरी आदत तीसरी आदत की अनिवार्य शर्त हैं। बिंदुवार तरीके से – आप तब तक सिद्धांत केंद्रित नहीं बन सकते जब तक :-

1 ) आप अपने प्रोएक्टिव स्वाभाव को पहचान कर उसे विकसित नहीं कर लेते।

2 ) आप अपने पैराडाईम्स  के प्रति जागरूक नहीं होते और यह समझ नहीं लेते की इसे सिद्धांतो के सामजस्य में लेन के लिए किस तरह       बदला जा सकता है।

3 ) आपके पास जीवनदृष्टि या फोकस ना हो कि आप कौन सा अनूठा योगदान दे सकते है।

प्रथम आदत कहती है “आप रचयिता है” ।  दूसरी आदत प्रथम रचना है,  यह एक मानसिक रचना है जो कल्पना पर आधारित है।तीसरी आदत  द्वितीय रचना है यानि भौतिक रचना है। इसकी नीव या आधार ऊपर वर्णित तीन बिंदु है।

आत्म निर्भर इच्छा की  शक्ति 

आत्म – जागरूकता , कल्पना और विवेक के अलावा आत्म निर्भर इच्छा वह चौथी मानवीय प्रतिभा है जो प्रभावकारी आत्म प्रबंधन को सचमुच संभव बनती है। आत्म निर्भर इच्छा निर्णय लेने और विकल्प चुनने तथा उसके अनुरूप कार्य करने की योग्यता है। यह प्रोएक्टिव तरीके से उस  प्रोग्राम  पर कार्य करने की क्षमता है, जिसे हमने अन्य तीन प्रतिभाओ की मदद से तैयार किया है। यह खुद से वायदे करने और उन्हें पूरा करने की योग्यता है। यह स्वयं का सम्मान है, चरित्र-आधारित नीतिशास्त्र का मूल हिस्सा है और प्रोएक्टिव विकास का सार है।

प्रभावकारी मैनेजमेंट का अर्थ है पहली चीज़ो को पहले रखना। जहा लीडरशिप यह तय करती है कि “पहली चीज़ क्या है “, वहीं  मैनेजमेंट उन्हें हर दिन,  हर पल पहले स्थान पर रखता है।

मैनेजमेंट का अर्थ है अनुशासन , निर्णयों पर अमल करना।  अनुशासन(discipline ) शब्द शिष्य(disciple ) शब्द से बना है – किसी जीवनदर्शन का शिष्य , किसी सिद्धांत-समूह का शिष्य, जीवनमूल्यों के किसी समूह का शिष्य , किसी असाधारण लक्ष्य या उस लक्ष्य का प्रतिनिधित्व करने वाले व्यक्ति का शिष्य।

सफल व्यक्तियों में ऐसे काम करने की आदत होती है , जिन्हे करने असफल व्यक्ति पसंद नहीं करते।  यह जरूरी नहीं है कि सफल लोगो को भी यह काम करना पसंद हो , परन्तु उनकी नापसंदगी उनके लक्ष्य की शक्ति के अधीन रहती है।

टाइम मैनेजमेंट 

टाइम मैनेजमेंट के क्षेत्र में हर पीढ़ी अपने पहले वाली पीढ़ी से आगे प्रगति करती है- हर पीढ़ी हमें अपने जीवन का अधिक नियंत्रण लेने की और आगे बढाती है। टाइम मैनेजमेंट की एक नयी पीढ़ी का उदय हो रहा है , जिसकी प्रकृति पुरानी पीढ़ियों से बिलकुल अलग है। यह मानती है कि दरअसल ” टाइम मैनेजमेंट ” वाक्यांश ही गलत है – चुनौती समय का प्रबंधन करना नहीं है , बल्कि खुद का प्रबंधन करना है। इस पीढ़ी की अपेक्षायें चीज़ो और समय पर अपना ध्यान केंद्रित नहीं करती है। इसके बजाय वे सम्बन्धो की रक्षा करने , उन्हें प्रगाढ़ बनाने तथा परिणाम हासिल करने पर अपना ध्यान केंद्रित करती है

टाइम मैनेजमेंट मैट्रिक्स 

किसी गतिविधि को परिभाषित करने वाले दो तत्व है – अत्यावश्यक और महत्वपूर्ण।अत्यावश्यक चीज़े हमसे तत्काल काम करवाती है।अत्यावश्यक का अर्थ है इसकी तरफ तत्काल ध्यान देने की जरूरत है जैसे फ़ोन की बजती हुई घंटी , संकट , समय सीमा वाले प्रोजेक्ट। दूसरी तरफ महत्वपूर्ण चीज़े जरूरी नहीं की अत्यावश्यक हो, जैसे नए अवसर पहचानना, सम्बन्ध बनाना, योजना बनाना , मनोरंजन इत्यादि।

एक क्रास की कल्पना करें। जब आप इसे खींचते हैं, तो चार खाली स्थान दिखाई देते हैं। उनमें से प्रत्येक स्टीफन  कवी  के चतुर्थांशों में से एक है।

                                                                                        पहला चतुर्थांश

ऊपर, बाईं ओर उन चतुर्भुजों में से पहला है – अत्यावश्यक और महत्वपूर्ण।इस स्थान में उन सभी कार्यों को स्थित किया जाता है जो किसी भी परिस्थिति में स्थगित नहीं किए जाने चाहिए और न ही होने चाहिए। यह वास्तव में प्राथमिकता है, जिसकी बाकी की तुलना में अधिक प्रासंगिकता है. यह मांग करता है कि अभी इसमें भाग लिया जाए और किसी भी अन्य गतिविधि को अलग रखा जाए, जब तक इसका समाधान नहीं होता।

                                                                                          दूसरा चतुर्थांश

स्टीफन कोवे के चतुर्थांशों में से दूसरा उस से मेल खाता है जिसे तुरंत उपस्थित नहीं होना चाहिए, लेकिन इसका बहुत महत्व है। दूसरे शब्दों में, जो महत्वपूर्ण है लेकिन अत्यावश्यक नहीं । ये ऐसी गतिविधियाँ हैं जो अल्पावधि में निर्णायक नहीं हैं, लेकिन मध्यम और दीर्घकालिक में.इस चतुर्थांश में वे सभी कार्य हैं जो जीवन या मृत्यु नहीं हैं, लेकिन वे जीवन की गुणवत्ता या कल्याण के लिए निर्णायक हैं. पहला स्वास्थ्य है। सब कुछ स्वास्थ्य पर निर्भर करता है और इसका ध्यान रखना महत्वपूर्ण है। ऐसा नहीं करने का प्रभाव केवल दीर्घकालिक रूप में देखा जा सकता है और विनाशकारी हो सकता है।

                                                                                         तीसरा चतुर्थांश

इस चतुर्थांश में उन सभी शानदार गतिविधियों को स्थित किया जा सकता है जो आदत या संयोग से होती हैं।   अर्थात अत्यावश्यक लकिन महत्वपूर्ण नहीं। उदाहरण के लिए, किसी से मिलना और थोड़ी देर के लिए चैटिंग करना, कुछ फ़ोन , या कुछ महत्वहीन पहलू के बारे में सामाजिक नेटवर्क द्वारा चर्चा।

                                                                                        चौथा चतुर्थांश

न तो अत्यावश्यक प्रकृति का है, न ही इसकी अधिक प्रासंगिकता या महत्व है। फिर भी, ये ऐसी गतिविधियाँ हैं जो हमारे समय का हिस्सा हैं।जैसे बेकार का काम , आनंददायक गतिविधियाँ , समय बर्बाद करने वाले लोग।इस चक्र में पूरी तरह से अप्रासंगिक क्रियाएं हैं जैसे कि हर पांच मिनट में ईमेल को देखना. या सोशल नेटवर्क पर एक वार्तालाप का पालन करें जहां कहने के लिए और भी चीजें नहीं हैं।

इस मॉडल में  विशेष रूप से चतुर्थांश 2 में ध्यान केंद्रित करने की सिफारिश की है। जो हमारे लिए सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण और हमारे लक्ष्य के लिए अति – आवश्यकहै उस काम को हमें पहले प्रथमिकता देनी है । उसके बाद अन्य उपयोगी कार्य करे ।यह वह जगह है जहां संतुष्टि ,खुशी और उन्नति है । अगर हम स्पष्ट रूप से पहचान कर सकते हैं कि वहां क्या चल रहा है और उस पर ध्यान कैसे केंद्रित करना है, तो स्टीफन कवी  मॉडल ने अपना उद्देश्य पूरा किया। 

 

आगे हम  HABIT- 4 के साथ भाग 5 –  में कंटिन्यू करेंगे। (next we will  continue with habit 4 in part 5 )

द्वारा – श्यामा पटेल , रायगढ़ ( छत्तीसगढ़ )

 

 

 

 

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